यह कहानी काल्पनिक नहीं बल्कि आइने की तरह साफ प्रतिबिंब है। इस कहानी में बहुजन समाज का कड़वा सच छिपा है। हर कोई बहुजन समाज को भेड़ समझकर इस्तेमाल करता है। यही कारण है कि गर्व से अपने आपको 85% कहने वाले मूलनिवासी आज तक सत्ता की दहलीज को छू तक नहीं पाए हैं। यह कहानी गड़रिया, भेड़िया, भेड़ और नए घर की कहानी है। फैसला आपको करना है कि आप भेड़ बनना पसंद करेंगे या बहुजन समाज के एक समझदार इंसान के साथ-साथ सच्चे भीम सैनिक बनना पसंद करेंगे।
ये कहानी पढ़ें और यदि कहानी में कोई सच छिपा नजर आए तो शेयर करके सभी को बताएं ताकि भेड़ बनने के बजाए सभी सच्चे भीम सैनिक बन सकें :-
भेड़ों का एक बहुत बड़ा बाड़ा था। अन्य जानवरों की संख्या के मुकाबले भेड़ों की संख्या कहीं अधिक थी। लेकिन भेड़ों में एकता नाम की कोई चीज नहीं थी। वे आपस में लड़ती रहती थी। सारी भेड़ें अपनी ढपली अपना राग अलापती थी और गड़रिया उन भेड़ों को जमकर इस्तेमाल करता था। यहां गडरिए की भूमिका में मनुवादी राजनीतिक दल हैं। 'फूट डालो राज करो' का नियम सिर चढ़कर बोलता था। जमकर संगीत बजता था और जमकर नृत्य होता था। सारी भेड़ें गडरिए की गुलाम थी। वे गडरिए को अपना मालिक मानती थी। वक्त लगातार बदल रहा था। उन्हें गुलामी और आजादी में फर्क नजर आने लगा था। भेड़ें मजबूत हो रही थी और गड़रिया कमजोर हो रहा था। भेड़ें अब शेर की भूमिका में आने को बेताब थी। लंबे संघर्ष के बाद उन्हें 'अपना घर' भी मिल गया था। वहीं गडरिए के पास भेड़ों की संख्या लगातार कम होती जा रही थी। अपना सारा राज-पाट छीनने के डर से गडरिए ने साम-दाम-दंड-भेद का दांव खेला। जो भेड़ें गडरिए का साथ छोड़कर जा चुकी थी उनके बीच भेड़ की खाल में एक खतरनाक भेड़िए को उतारने का निर्णय लिया गया। ये ज्यादा पुरानी बात नहीं बल्कि ये आज से 3 साल पहले वर्ष 2007 की बात है। जंगली जानवरों ने जमकर आतंक मचाया था।
सारी भेड़ें अपने घर को मजबूत करने के लिए दिन-रात मेहनत कर रही थी। ये घर इतना मजबूत था कि गड़रिया का सारा राजपाट एक झटके में छीन लिया जा सकता था। एक सूबे में तो 4 बार सिर का ताज अपना लिया गया था। आतंक के बीच एक दिन अनोखी घटना घटित हुई। एक बार भेड़ों के बीच चुस्ती-फूर्ति से परिपूर्ण भेड़ की खाल में एक भेड़िया घुस आया। अति सुन्दर लिबास में सजा-धजा भेड़िया किसी महाराज से कम नहीं लग रहा था। भेड़ की खाल में सुंदर-कीमती लिबास पहने भेड़िए को भेड़ें अपना राजा समझ रही थी। जो इस साजिश से अनजान थी कि भेड़ की खाल में लाया गया यह खूंखार भेड़िया उनका दुश्मन है। भेड़िया रोजाना नए-नए स्टाइल में नृत्य करता और भेड़ों को अपनी तरफ आकर्षित करता। भेड़ों के हक-अधिकारों के लिए भेड़िया कई-कई दिन अपने आपको गुफा में कैद भी कर लेता था। भेड़िया रुदन करवाता और गुफा से बाहर अा जाता था। कभी-कभी भेड़िया नृत्य करते-करते बेहोश हो जाता और सारी भेड़ें जोर-जोर से विलाप करती। धीरे-धीरे भेड़िया 'भेडप्रिय' होता गया और भेड़ों का सरताज बनने लगा। अपने जोशीले नृत्य से भेड़िए ने सारी भेड़ों को मंत्रमुग्ध कर लिया था। वक्त बदलता गया और भेड़ें उसकी दीवानी हो गई। बीच-बीच में गड़रिया भेड़िए को 'एंटी डोज' भी देता रहता था। ताकि भेड़िए की लार ना टपके और उसकी पोल ना खुल जाए। आखिर वो वक्त अा ही गया जिसके लिए भेड़िए को भेड़ की खाल में मैदान में उतारा गया था।
एक दिन भेड़िए ने भेड़ों की एक सभा बुलाई और एक नए घर की तरफ जाने का इशारा किया। इससे सारी भेड़ों में हड़कंप मच गया। भेड़िए के प्रेम में मोहित अनेकों भेड़ें अपने पुराने घर को छोड़कर नए घर में जाने को तैयार थी। लेकिन उनका दिल पुराने घर को छोड़ने पर अब भी तैयार नहीं था। लेकिन भेड़िए ने तुष्टिकरण की नीति का सहारा लेकर फूट डालनी शुरू कर दी। इसके लिए "SILENT MODE में होने वाले बिखराव और मुंह की मार्केटिंग से डलती फूट" का बखूबी सहारा लिया गया। ये लेख भी जल्द आप सभी के सामने होगा। अनेकों भेड़ों ने भेड़िए के मोह को त्याग दिया था और अपने पुराने घर को प्रेम करती थी।
एक कड़वा सच यह भी है कि भेड़ों की जन्मजात आदत होती है कि एक भेड़ के पीछे सारी भेड़ें सिर झुकाकर चलती रहती हैं। उन्हें यह नहीं मालूम होता कि अंजाम क्या होगा। भेड़िए के प्रेम में पागल कुछ भेड़ें एक-एक करके नए घर की तरफ चल दी। उनमें अनेकों भेड़ें ऐसी थी जिन्हें गंदगी फैलाने के चलते लात मारकर पुराने घर से बाहर निकाला गया था। बड़ी खुशी से नाचती-गाती भेड़ें अलग-अलग आवाज में गीत गुनगुनाती जा रही थी। दरअसल भेड़िया तो सिर्फ एक मोहरा था। जंगल के अनेकों खतरनाक जानवर भेड़ों का मांस खाने के लिए लालायित थे। नया घर किसी लाक्षागृह से कम नहीं था। यह एक अंधा कुआं था। भेड़िया एक तरफ खड़ा होकर भेड़ों को अंधे कुएं की तरफ धकेलता जा रहा था और भेड़ें एक-एक करके अंधे कुएं में गिरती जा रही थी। जैसे ही भेड़ें अंधे कुएं में समा गई वैसे ही छोटे-छोटे राजनीतिक दलों की भूमिका में अन्य जंगली जानवरों ने भेड़ों का स्वादिष्ट मांस जमकर खाया और भेड़िए ने भी खूब दावत उड़ाई। गड़रिया का अन्य भेड़ों पर राज कायम रहा। संघर्ष की यह लड़ाई अब 100 साल पीछे जा चुकी थी। इस लेख में वो सच्चाई छिपी है जिसे आज के युवा वर्ग सहित समस्त बहुजन समाज को समझना होगा। फैसला आपको स्वयं करना है कि आप भेड़ बनकर अंधे कुएं में गिरकर शिकार बनना पसंद करेंगे या अपने पुराने घर में सुरक्षित रहेंगे।
लेखक :
नवाब सतपाल तंवर
अखिल भारतीय भीम सेना चीफ़
ये कहानी पढ़ें और यदि कहानी में कोई सच छिपा नजर आए तो शेयर करके सभी को बताएं ताकि भेड़ बनने के बजाए सभी सच्चे भीम सैनिक बन सकें :-
भेड़ों का एक बहुत बड़ा बाड़ा था। अन्य जानवरों की संख्या के मुकाबले भेड़ों की संख्या कहीं अधिक थी। लेकिन भेड़ों में एकता नाम की कोई चीज नहीं थी। वे आपस में लड़ती रहती थी। सारी भेड़ें अपनी ढपली अपना राग अलापती थी और गड़रिया उन भेड़ों को जमकर इस्तेमाल करता था। यहां गडरिए की भूमिका में मनुवादी राजनीतिक दल हैं। 'फूट डालो राज करो' का नियम सिर चढ़कर बोलता था। जमकर संगीत बजता था और जमकर नृत्य होता था। सारी भेड़ें गडरिए की गुलाम थी। वे गडरिए को अपना मालिक मानती थी। वक्त लगातार बदल रहा था। उन्हें गुलामी और आजादी में फर्क नजर आने लगा था। भेड़ें मजबूत हो रही थी और गड़रिया कमजोर हो रहा था। भेड़ें अब शेर की भूमिका में आने को बेताब थी। लंबे संघर्ष के बाद उन्हें 'अपना घर' भी मिल गया था। वहीं गडरिए के पास भेड़ों की संख्या लगातार कम होती जा रही थी। अपना सारा राज-पाट छीनने के डर से गडरिए ने साम-दाम-दंड-भेद का दांव खेला। जो भेड़ें गडरिए का साथ छोड़कर जा चुकी थी उनके बीच भेड़ की खाल में एक खतरनाक भेड़िए को उतारने का निर्णय लिया गया। ये ज्यादा पुरानी बात नहीं बल्कि ये आज से 3 साल पहले वर्ष 2007 की बात है। जंगली जानवरों ने जमकर आतंक मचाया था।
सारी भेड़ें अपने घर को मजबूत करने के लिए दिन-रात मेहनत कर रही थी। ये घर इतना मजबूत था कि गड़रिया का सारा राजपाट एक झटके में छीन लिया जा सकता था। एक सूबे में तो 4 बार सिर का ताज अपना लिया गया था। आतंक के बीच एक दिन अनोखी घटना घटित हुई। एक बार भेड़ों के बीच चुस्ती-फूर्ति से परिपूर्ण भेड़ की खाल में एक भेड़िया घुस आया। अति सुन्दर लिबास में सजा-धजा भेड़िया किसी महाराज से कम नहीं लग रहा था। भेड़ की खाल में सुंदर-कीमती लिबास पहने भेड़िए को भेड़ें अपना राजा समझ रही थी। जो इस साजिश से अनजान थी कि भेड़ की खाल में लाया गया यह खूंखार भेड़िया उनका दुश्मन है। भेड़िया रोजाना नए-नए स्टाइल में नृत्य करता और भेड़ों को अपनी तरफ आकर्षित करता। भेड़ों के हक-अधिकारों के लिए भेड़िया कई-कई दिन अपने आपको गुफा में कैद भी कर लेता था। भेड़िया रुदन करवाता और गुफा से बाहर अा जाता था। कभी-कभी भेड़िया नृत्य करते-करते बेहोश हो जाता और सारी भेड़ें जोर-जोर से विलाप करती। धीरे-धीरे भेड़िया 'भेडप्रिय' होता गया और भेड़ों का सरताज बनने लगा। अपने जोशीले नृत्य से भेड़िए ने सारी भेड़ों को मंत्रमुग्ध कर लिया था। वक्त बदलता गया और भेड़ें उसकी दीवानी हो गई। बीच-बीच में गड़रिया भेड़िए को 'एंटी डोज' भी देता रहता था। ताकि भेड़िए की लार ना टपके और उसकी पोल ना खुल जाए। आखिर वो वक्त अा ही गया जिसके लिए भेड़िए को भेड़ की खाल में मैदान में उतारा गया था।
एक दिन भेड़िए ने भेड़ों की एक सभा बुलाई और एक नए घर की तरफ जाने का इशारा किया। इससे सारी भेड़ों में हड़कंप मच गया। भेड़िए के प्रेम में मोहित अनेकों भेड़ें अपने पुराने घर को छोड़कर नए घर में जाने को तैयार थी। लेकिन उनका दिल पुराने घर को छोड़ने पर अब भी तैयार नहीं था। लेकिन भेड़िए ने तुष्टिकरण की नीति का सहारा लेकर फूट डालनी शुरू कर दी। इसके लिए "SILENT MODE में होने वाले बिखराव और मुंह की मार्केटिंग से डलती फूट" का बखूबी सहारा लिया गया। ये लेख भी जल्द आप सभी के सामने होगा। अनेकों भेड़ों ने भेड़िए के मोह को त्याग दिया था और अपने पुराने घर को प्रेम करती थी।
एक कड़वा सच यह भी है कि भेड़ों की जन्मजात आदत होती है कि एक भेड़ के पीछे सारी भेड़ें सिर झुकाकर चलती रहती हैं। उन्हें यह नहीं मालूम होता कि अंजाम क्या होगा। भेड़िए के प्रेम में पागल कुछ भेड़ें एक-एक करके नए घर की तरफ चल दी। उनमें अनेकों भेड़ें ऐसी थी जिन्हें गंदगी फैलाने के चलते लात मारकर पुराने घर से बाहर निकाला गया था। बड़ी खुशी से नाचती-गाती भेड़ें अलग-अलग आवाज में गीत गुनगुनाती जा रही थी। दरअसल भेड़िया तो सिर्फ एक मोहरा था। जंगल के अनेकों खतरनाक जानवर भेड़ों का मांस खाने के लिए लालायित थे। नया घर किसी लाक्षागृह से कम नहीं था। यह एक अंधा कुआं था। भेड़िया एक तरफ खड़ा होकर भेड़ों को अंधे कुएं की तरफ धकेलता जा रहा था और भेड़ें एक-एक करके अंधे कुएं में गिरती जा रही थी। जैसे ही भेड़ें अंधे कुएं में समा गई वैसे ही छोटे-छोटे राजनीतिक दलों की भूमिका में अन्य जंगली जानवरों ने भेड़ों का स्वादिष्ट मांस जमकर खाया और भेड़िए ने भी खूब दावत उड़ाई। गड़रिया का अन्य भेड़ों पर राज कायम रहा। संघर्ष की यह लड़ाई अब 100 साल पीछे जा चुकी थी। इस लेख में वो सच्चाई छिपी है जिसे आज के युवा वर्ग सहित समस्त बहुजन समाज को समझना होगा। फैसला आपको स्वयं करना है कि आप भेड़ बनकर अंधे कुएं में गिरकर शिकार बनना पसंद करेंगे या अपने पुराने घर में सुरक्षित रहेंगे।
लेखक :
नवाब सतपाल तंवर
अखिल भारतीय भीम सेना चीफ़
